बंजर
दिल्ली में बैठे हमारे आका, हमें आतंकी कहने वालों— निकालो अपनी सारी बंदूक़ें, वो सारे ख़ंजर जो बचा‑बचा कर रखे हैं तुमने। तान दो हम पर, चला दो हमारे सीने पर— हमीं हैं तुम्हारे दुश्मन, है न ? जलती चिताओं की आँच पर सेंक लो राजनीति की रोटियाँ। उनकी चीख़ों को ईंधन बनाकर चलाओ अपना खेल पर याद रखना— जब ये लहलहाते खेत लाशों से पट जाएँगे, कुछ ज़िंदा, कुछ मुर्दा और होगी हमारी ज़मीं हमारे ही लहू से लहुलुहान , तब रातें ख़ौफ़नाक होंगी, उजाले दर्दनाक, और मंजर इतना भयावह कि आँखें खुली होंगी पर दुनिया बुझी हुई लगेगी तुम ही होगे इस ज़मीं के कातिल जिसे तुम पट्टी समझ रहे हो, वो दरअसल जलती हुई लाशों से उठता धुआँ है— और उस धुएँ में सब कुछ साफ़ दिख रहा है मुझे। वो मंजर… वो गिद्धों की टोली, जो नोच रही है बोटियाँ और सेंक रही है अपनी रोटियाँ— राजनीति की। कुछ अंधे देख रहे हैं खुली आँखों से ये मंजर, और हमारी ज़मीं धीरे‑धीरे होती जा रही बंजर ।


