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चाय की कविता

तुमने जिसे चाय समझ कर पी है  फिर से एक नयी लत मोल ली है  इसमें नशा है आदमख़ोरी का इसमें नशा है हैवानियत का एक वो भी घूँट था इसमें जिसे पीकर मर गया वो इंसान जो था तुम्हारे भीतर एक वहशी भर रह गया है तुम्हारे अंदर हैवान तो तुम बन ही चुके हो बस तुम्हें अंदाज़ा नहीं है जब तक तुम्हें होश आएगा देर हो चुकी होगी जल चुके होंगे तुम्हारे एहसास मर चुके होंगे तुम्हारे जज़्बात देश ,  राष्ट्र ,  धर्म पहले भी ज़िंदा थे देश राष्ट्र ,  धर्म आगे भी ज़िंदा रहेंगे ज़िंदा तो शायद तुम भी बच जाओगे पर तुम्हारी आत्मा का क्या  ? वो आत्मा जो अमर होती है तुम्हारी आत्मा ,  तुम्हारी रूह का क्या  ? जब तक तुम्हें होश आएगा बहुत देर हो चुकी होगी तुम्हारी आत्मा मर चुकी होगी तुम्हारे जज़्बातों की तरह। वैसे अच्छा ही है ऐसी रूहों का मर जाना जो अमर सिर्फ़ नाम मात्र की हो जिनमें कोई संवेदना ही ना हो ऐसे ही रूहें मरती रहेंगीं सिर्फ़ देह बचते रहेंगे। देश राष्ट्र और धर्म ज़िंदा हैं और ज़िंदा रहेंगे और चाय  ? चाय भी बनती रहेगी  …. कड़क ,  कुल्हड़ या अदरक वाली फीकी ,  मसाले...

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