ग़ुरूर

जो ग़ुरूर इतना है अपनी हस्ती का उन्हें
तो बेशक ना मिले हमसे वो
पर दिल तोड़ने का हक़ तो
हमारी महबूबा तक को ना था

ग़म ये नहीं की बे-आबरू हुए खुद के शहर में
ग़म हमें इस बात का है के
जो मेरे गिरेबाँ तक पहुँचा
वो हाथ किसी दोस्त का था

अपनों की कमी नहीं थी इस शहर में
हम अजनबी भी उसी शहर में हुए
जिस शहर की हर गली में 
एक मकाँ मेरे किसी दोस्त का था

इससे तो अच्छा था
कुछ दुश्मन ही बना लेते तुम “संजय”
जो अनजाने में मिल भी जाते
तो नज़रें मिल जाने का डर ना होता
शहसवार हम भी कोई कम नहीं
उठ जाते शान से,
जो खुद की नज़रों में गिर जाने का डर ना होता

ज़िंदगी की रहगुज़र में खल्क़ मिलते रहेंगे
इस मोड़ तक तुम, उस मोड़ तक कोई और सही

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