शर्मिंदा (On Judging people)
किसी की सुर्ख़ आँख देख ये ना समझना
वो शख़्स मयखानो के चक्कर लगाता है
एक मिला था मुझे सुर्ख़ आँखों वाला,
वो मलबों में दबे बच्चों की लाशें उठाता है
जिन घरों में कभी महफ़ूज़ थे वो,
आज उन्ही के मलबों के नीचे उन्हें दफ़न पाता है
कुछ बच्चों के नन्हें हाथों में दबे क़ंचो को देख,
उसे भी अपना बचपन याद आता है
के अपनी उस नासमझ पर आज तक शर्मिंदा हूँ,
शुक्र है के मैं अब भी ज़िंदा हूँ

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